Статья опубликована в рамках: IX Международной научно-практической конференции «Наука вчера, сегодня, завтра» (Россия, г. Новосибирск, 10 февраля 2014 г.)

Наука: Филология

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О РУССКОМ «ОРФЕЕ». К 300-ЛЕТИЮ К.В. ГЛЮКА // Наука вчера, сегодня, завтра: сб. ст. по матер. IX междунар. науч.-практ. конф. № 2(9). – Новосибирск: СибАК, 2014.
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О  РУССКОМ  «ОРФЕЕ».  К  300-ЛЕТИЮ  К.В.  ГЛЮКА


Наумов  Александр  Владимирович


канд.  искусствоведения,  доцент  Московской  государственной  консерватории  им.  П.И.  Чайковского,  РФ,  г.  Москва


E-mailalvlnaumov@list.ru

 

Настоящий  исследовательский  очерк  является  продолжением  разработки  темы,  связанной  с  вокальной  стилистикой  хоровых  номеров  в  операх  К.В.  Глюка,  открытой  в  ознаменование  300-летнего  юбилея  великого  австрийского  композитора  и  освещенной  на  данный  момент  уже  в  двух  публикациях  [см.  10;  11].  Прежде  были  рассмотрены  проблемы  преломления  эстетической  нормы  итальянского  сольного  bel  canto  в  фактурных  условиях  оперной  массовой  сцены  (на  примере  «Париса  и  Елены»),  а  также  вопрос  о  трансформации  вокально-хоровой  поэтики  при  переводе  либретто  с  итальянского  на  французский  язык  в  ходе  создания  «парижских»  редакций  взамен  «венских»  (главным  объектом  наблюдения  здесь  послужил  «Орфей»).  Параллельно  вскользь  затрагивался  материал  и  других  т.  н.  «реформаторских»  сочинений  композитора  —  «Альцесты»,  «Армиды»,  «Ифигении  в  Авлиде»,  «Ифигении  в  Тавриде»,  «Нарцисса  и  Эхо»,  к  которым  мы  еще  надеемся  возвратиться  в  будущем  с  целью  более  детального  анализа.  На  фоне  обозначенных  выше  крупных  музыкально-эстетических  и  вокально-методологических  пунктов  предмет  данной  статьи  выглядит  мимолетной  ремаркой  к  развернутому  200-летнему  повествованию  о  сценической  истории  глюковских  опер.  Речь  пойдет  о  русскоязычной  версии  «Орфея»,  созданной  специально  для  постановки  Мариинского  театра  в  1911  г.:  «Перевод  приобретен  Дирекцией  императорских  театров  специально  для  постановки  на  казенных  сценах  С.-Петербурга  и  Москвы…»  —  значится  на  титульном  листе  напечатанного  Бесселем  в  1912  г.  клавира.  Она  изредка  исполнялась  в  довоенном  СССР,  была  записана  в  1952  г.  на  грампластинку…  Время  от  времени  появлялась  и  потом  на  провинциальных  подмостках,  чтобы  в  конце  ХХ  в.  без  боя  уступить  плацдарм  итальянскому  и  французскому  оригиналам,  претворенным  с  той  или  иной  степенью  аутентичности.  Как  феномен,  формально  просуществовавший  чуть  более  полувека,  а  на  деле  —  и  еще  меньше,  в  истории  отечественной  культуры  этот  «Орфей»  значил  достаточно  много,  он  стал  крепким  дидактическим  подспорьем  для  «школьного»  Глюка,  изучаемого  в  советских  училищах  и  консерваториях,  и  вписался  в  целый  ряд  разнообразных  контекстов  —  культурных  и  социолого-политических.  Большая  их  часть  охвачена  в  замечательной  монографии  Л.  Кириллиной  [5,  с.  89—96],  но  ряд  вопросов  так  и  остался  без  ответа;  может  быть,  эти  ответы  разумелись  сами  собой,  а  может,  они  в  принципе  были  не  столь  обязательны,  но  мы  все-таки  полагаем  целесообразным  снова  их  искать.

Разрешение  самого  первого  недоумения  лежит,  что  называется,  на  поверхности:  почему  «русский  Глюк»  возник  только  в  начале  ХХ  в.?  Почему  полный  клавир  «Орфея»  с  русским  тестом  родился  в  1910  г.,  а  не  на  столетие  раньше,  хотя  сочинения  композитора  были  известны  и  ставились  в  России?  Да  потому,  что  они  на  протяжении  целого  века  считались  прерогативой  иностранных  —  итальянских,  французских  и  немецких  —  трупп,  квартировавших  в  Петербурге  на  казенном  содержании.  Те,  со  своей  стороны,  не  слишком  жаловали  глюковские  музыкальные  драмы,  предпочитая  более  «доступные»  сочинения  Моцарта  и  обреченные  на  успех  «шлягеры»  Россини-Беллини-Доницетти-Верди.  По  аналогичным  причинам  не  входили  сочинения  «космополита»  —  Глюка  в  число  фаворитов  французских  и  немецких  антрепренеров,  хотя  изредка  любая  труппа  включала  в  афишу  4—5  представлений  «Орфея»  или  «Ифигении».  Особое  затруднение  для  экономных  импресарио  представляли,  конечно,  хоровые  сцены:  массовость  представления  требовала  дополнительных,  почти  заведомо  бесперспективных  затрат.  Остальные,  собственно  эстетические  обстоятельства  прекрасно  иллюстрируют  общую  постановку  «проблемы  Глюка»  к  истории  музыки:  подобострастное  почтение  не  обратилось  любовью,  а  признание  заслуг  —  распространенностью  и  популярностью.  Публика  принимала  спектакли  холодно,  и  Россия  в  этом  плане  мало  отстала  от  Европы  [см.  12,  16—18].  До  самого  ХХ  в.  отечественные  музыканты  довольствовались  иностранными  изданиями  партитур  и  клавиров,  за  исключением  отдельных  номеров.  К  примеру,  знаменитая  ария  Орфея  и  еще  пара  ариозо  главного  героя  время  от  времени  печатались  для  концертного  и  домашнего  музицирования,  они  насчитывают  по  нескольку  переводов  различного  качества.  Проблемы  соответствия  авторскому  вокальному  стилю  и  исполнительской  идиоматичности  решались  в  зависимости  от  литературного  мастерства  и  общей  просвещенности  изготовителей  русских  версий,  а  «авторские  права»  либреттистов  Кальцабиджи  и  де  Молина  вообще  учитывались  в  последнюю  очередь. 

Вс.  Мейерхольд,  постановщик  ставшего  знаменитым  спектакля  Мариинского  театра  1911  г.,  спустя  год  после  премьеры  записал  в  автобиографическом  документе:  «”Орфей”  ставился  по  партитуре,  изданной  в  1900  году  у  ADurand…»  [9,  с.  255].  Переработка  французского  текста  парижской  редакции  была  заказана  В.  Коломийцеву  (1868—1932)  —  личности  достаточно  известной  и  как  переводчик  в  представлениях  не  нуждающейся,  одному  из  основоположников  современного  русского  «вокального  перевода»  [7].  По  сей  день  многие  романсы  на  стихи  И.-В.  Гёте,  а  также  «Песни  об  умерших  детях»  Г.  Малера,  привычны  для  русских  слушателей  именно  в  изложении  этого  человека.  Обратим  внимание  только  на  некоторые  детали,  кое-что  проясняющие  в  той  вокально-стилевой  картине,  которую  мы  будем  рассматривать  ниже.  Непосредственным  поводом  к  приглашению  Коломийцева,  несомненно,  послужило  завершение  и  публикация  им  в  1910  г.  полного  русского  текста  вагнеровского  «Парсифаля»  [6].  Театр,  направляемый  директором  В.  Теляковским  на  «серьезный»  репертуарный  курс  [13],  планировал,  судя  по  всему,  двигаться  от  «Тристана  и  Изольды»  (постановка  1909  г.)  в  сторону  воплощения  оперной  мистерии.  Однако  на  пути  этой  идеи  встала  неколебимая  русская  церковная  цензура:  по  мнению  иерархов,  легенда  о  Граале  для  театра  решительно  не  годилась.  «Орфей»,  а  чуть  позже,  в  1912  г.,  «Электра»  Р.  Штрауса  (все  —  постановки  Мейерхольда)  стали  своего  рода  «эрзац-Парсифалями».  Многое  в  облике  этих  представлений  подмечалось  рецензентами  и  осмысливалось  историками  именно  с  позиции  этого  несостоявшегося  свершения.  Так,  А.  Мацкин  написал  в  конце  1960-х:  «…эпоха  с  ее  пока  еще  подземными  катаклизмами  повернулась  к  Мейерхольду  своей  трагической  стороной,  и  он,  вопреки,  всем  земным  привязанностям,  ответил  ей  идеей  спасительного  забвения,  идеей,  по  неожиданной  связи  ассоциаций  тревожно  прозвучавшей  в  старой  опере  Глюка…»  [8,  с.  261].  Впрочем,  для  современников  не  менее  значимы  были  и  отсылки  к  старине  не  столь  глубокой,  мирискусническое  любование  наследием  «галантного  века»:  «…постановка  “Орфея”  входит  как  часть  в  эту  тягу  к  старине,  в  эту  тоску  по  старине,  охватившую  нас  с  такой  стихийной  силой.  Старина  для  нас  —  красота,  и  красота  —  старина…»  —  писал  обозреватель  «Русского  слова»  [1,  с.  233].  Просвещенный  стилист  А.  Бенуа,  правда,  возражал:  «О  том,  что  такое  Глюк,  —  художники,  ставившие  «Орфея»,  просто  забыли.  Они  думали  о  “стиле  XVIII  в.”,  которому  искренний  Глюк  был  неумолимый  враг  <…>;  они  думали  об  изяществе,  грации,  кокетстве,  блеске,  но  они  забыли  совершенно,  что  все  это  Глюк  готов  был  принести  в  жертву  главному  –  искренности  проявленного  чувства  и  строгой  красоте»  [4,  с.  241].  Прав  ли  известный  художник  и  театральный  деятель  в  своем  возмущении  и  критике?  Вероятно,  да,  но  для  нас  ныне  важнее  не  сама  его  правота,  но  прозорливость  в  изобличении  мотивов,  двигавших  создателями  спектакля. 

Кто  именно  был  «автором  успеха»  глюковской  премьеры  1911  г.,  решить  так  и  не  смогли,  но  успех  был  громким,  и  эхо  его  не  смолкает  уже  более  ста  лет.  До  сих  пор  восхищают  и  эскизы  декорационной  живописи  А.  Головина,  и  хореографические  (пластические)  зарисовки  М.  Фокина,  и  описанные  зрителями  премьеры  мизансцены  Мейерхольда:  все  это  тогда  же  ругали  за  избыточность  и  эстетизм.  Безоговорочно  принимали  только  исполнителей  главных  ролей:  Л.  Собинова,  М.  Кузнецову  (Эвридика)  и  Л.  Липковскую  (Амур),  особенно  хвалили  тончайшее  искусство  первого:  «…  при  бездне  вокального  выражения  дает  ту  “вокальную  пластику”,  которой  требует  Глюк…»  [3,  с.  239],  —  и  это  самый  сдержанно-конструктивный  из  журналистских  отзывов.  Для  русских  теноров  Орфей  остался  «счастливым  билетом»  —  впоследствии  партия  чрезвычайно  удалась  и  И.  Козловскому  в  сделанной  по  его  же  настоянию  записи  (спектакль  в  Большом  театре  после  революции  не  шел). 

Кажется,  именно  те  многообразные  проявления  старины,  что  так  влекли  к  творению  Глюка  художников  Серебряного  века,  сделали  композитора  персоной  non  grata  в  резко  потребовавшую  новизны  революционную  пору.  Ренессанс  интереса  к  античной  трагедии,  пережитый  отечественным  театром  в  1920-х,  оперы  не  затронул:  философский  объектив  глюковской  эстетики  был  слишком  развернут  в  сторону,  противоположную  массовому  сознанию,  слишком  индивидуалистичен  для  эпохи  площадных  празднеств.  Переживания  орфеев,  альцест  и  ифигений  выглядели  такими  же  притчами  во  языцех,  как  «нудят  на  диване  дяди  вани  и  тети  мани»  из  «Мистерии-буфф»  В.  Маяковского.  Для  последующих  лет  оказались  сложны  и  мифологические  сюжеты  —  публике  ощутимо  недоставало  эрудиции;  некоторые  фабульные  повороты,  кроме  всего  прочего,  выглядели  уж  слишком  современно  —  убийцы  на  троне,  призраки  мести,  утраты  и  оплакивания,  божественные  возмездия…  К  чему  это  все  победившему  пролетарию,  обитающему  в  стране  торжествующего  тоталитаризма?  Судьба  наследия  мастера  была  предрешена.

Вернемся  теперь  к  фигуре  В.  Коломийцева  и  остановимся  еще  на  одной  немаловажной  подробности  —  большинство  переводов,  когда-либо  сделанных  этим  плодовитым  литератором,  опирались  на  немецкие  первоисточники,  исключения  (французские  романсы)  крайне  редки.  Скорее  всего,  владел  он  и  другими  языками,  в  том  числе,  —  выпускник  юридического  факультета,  —  и  латынью,  однако,  никогда,  ни  до  «Орфея»,  ни  после,  итальянские  тексты  в  руки  не  брал.  Вопрос  —  по  какому  же  именно  тексту  переводилось  либретто,  —  скорее  всего,  навсегда  останется  без  ответа.  Возможно,  по  пресловутой  французской  партитуре  издания  1900  г.,  а  может  быть,  и  по  какой-нибудь  итальянской  версии.  Несомненно,  существовал  немецкий  клавир,  но  был  ли  он  доступен  в  те  годы  для  русских  музыкантов?  Партитура  с  параллельным  итальянским  и  немецким  текстом  была  издана  под  редакцией  Г.  Аберта  только  в  1914  г.,  впрочем,  это  и  не  та  редакция,  о  которой  идет  речь.  Не  стоило  бы  обсуждать  эти  гипотетические  детали,  если  бы  текст  Коломийцева  не  опровергал  столь  явно  им  же  самим  выдвинутые  и  пропагандируемые  принципы  эквиритмичности  перевода  певческих  текстов.  Это  меньше  сказывается  в  известных  сольных  номерах  и  речитативах,  где  «подгонка»  достаточно  тщательна,  и  очень  заметно  в  хоровых  эпизодах,  призванных  стать  центральным  объектом  второй  половины  повествования  в  данной  статье.  Позволю  себе  самоцитату:  «…в  самом  начале  знаменитого  траурного  хора  из  1  действия  «Орфея»  первая  же  строка  вместо  венского  (итальянского)  варианта  текста  AhSe  intorno  a  quest  urna  funesta  звучит  по-французски  как  Ah  dans  ce  bois  tranquille  et  sombre  <…>  Синтаксическая  структура  фразы  изменяется  необратимо:  цельное  построение,  дополненное  фонетическим  связыванием  (liaison)  заменяется  на  цезурованное  (в  русском  языке  после  слова  bois  (лес)  стояла  бы  запятая,  обособляющая  сложное  определение).  В  данном  контексте  приобретает  новое  значение  приготовленное  задержание  в  мелодии:  для  итальянского  слуха  оно  обозначало  одну  лишь  риторическую  фигуру  lamento,  для  француза  —  типичное  танцевальное  «приседание»  во  втором  такте.  Иначе  говоря,  в  венском  «Орфее»  звучала  четырехтактная  кантиленная  фраза,  а  в  парижском  —  две  двутактные»  [10].  В  русском  варианте  Коломийцева:  «Как  грустно  ветер  мирт  колышет…». 

 



Рисунок  1.  К.В.  Глюк,  «Орфей  и  Эвридика»,  сц.  1,  фрагмент  хоровой  партии

 

Если  во  французском  либретто  предполагалась  ясная  цезура  во  втором  такте,  а  у  Кальцабиджи  намечалась  хотя  бы  ее  возможность  (после  intorno),  то  здесь  подчеркивание  полукадансового  оборота  привело  бы  к  разрыву  слова  «ветер»,  не  говоря  уже  о  нарушении  смысла  фразы.  Совпадения  с  французским  оригиналом  и  далее  остаются  достоянием  случайности;  синтаксическое  сходство  с  итальянским  либретто  более  очевидно,  однако,  налицо  различие  поэтической  лексики.  Русский  автор  совмещает  слова  одного  либретто  с  грамматикой  другого,  но  делает  и  то,  и  другое  очень  неточно,  на  правах  вольного  пересказа.

Метаморфозы  не  остались  без  внимания  в  1911-м.  От  хоров  ждали  многого:  «Для  меня,  видавшего  «Орфея»  много  раз  в  Париже,  с  божественной  Дельной,  опера  эта  содержит  три  абсолютно  гениальные  страницы,  и  в  них-то  живет  душа  Глюка.  Из-за  них  стоит  и  нужно  ставить  «Орфея»,  —  мало  того,  —  из-за  них  нельзя  снимать  «Орфея»  с  репертуара.  Это  есть  «мера  вещей»,  точно  так  же,  как  в  живописи  «мера  вещей»  Станцы  Рафаэля  и  плафон  Сикстинской.  Три  эти  страницы  следующие:  все  первое  действие  до  момента,  когда  Орфей  остается  один;  сцена  в  аду  и,  наконец,  соло  флейты  в  Елисейских  полях  или,  скорее,  вся  сцена  в  Елисейских  полях.  Здесь  Глюк  поднялся  до  того,  что  выражено  прекрасным  французским  словом  sublime  [возвышенно  —  примеч.  ред]  …»  [4,  с.  242].  А.  Бенуа,  автор  этих  строк,  называя  в  качестве  «меры  вещей»  именно  массовые  фрагменты  оперы,  с  горечью  констатировал  —  в  постановке  «…было  скомкано,  смято  все  главное,  вся  душа  оперы…»,  «…зато  слабые  места  поднесены  с  какой-то  назойливой  отчетливостью…»  [4,  с.  241].  Мейерхольд  гордился  новаторством:  «…хор  в  сцене  Елисейских  полей  звучит  отдаленно,  из-за  кулис…»  [9,  с.  256],  а  рецензент  негодовал:  «ни  хора,  ни  оркестра  фактически  не  было  слышно…»  [4,  с.  242].  И  даже  благодушный,  не  втянутый  в  многолетнюю  полемику  рецензент  «Биржевых  ведомостей»  вначале  обмолвился  о  хоре,  «…на  долю  которого  выпала  такая  сложная  не  только  вокальная,  но  и  пластическая  задача…»  [3,  с.  236],  а  в  конце  рецензии  и  вовсе  обозвал  мастерство  композитора  в  этой  области  —  «бедовым»  [3,  с.  240].  Помилуйте,  это  ведь  не  баховские  фуги,  не  Dies  irae  Верди,  не  «Иоанн  Дамаскин»  Танеева,  —  какие  особые  сложности?  Видимо,  прозвучало  «бедово»  —  натужно  и  неестественно,  —  раз  произвело  такое  впечатление  на  слушателя. 

Оправдать  задним  числом  хор  Мариинского  театра  нам  не  удастся,  но  можно  хотя  бы  в  некоторой  степени  проверить  впечатления  на  примере  неоднократно  уже  упоминавшейся  записи  1952  г.  п/у  С.  Самосуда  (в  главных  ролях  И.  Козловский,  Е.  Шумская  (Эвридика),  Т.  Талахадзе  (Амур)).  Казалось  бы,  что  общего  —  разные  труппы,  разные  времена,  а  все-таки  сходств  больше  чем  различий.  Конечно,  С.  Самосуд  по  дирижерскому  темпераменту  никогда  не  напоминал  «очень  классически  настроенного»  Э.  Направника  на  премьере  1911  г.  Да  и  «императорский»  Большой  театр,  силы  которого  были  задействованы  в  записи,  по  творческой  форме  на  тот  момент  не  очень  напоминал  старые  Императорские  театры  на  их  высочайшем  взлете,  уже  чреватом  грядущим  упадком.  Подлинных  мировых  звезд  вроде  Ф.  Литвин  и  А.  Неждановой,  Л.  Собинова,  И.  Ершова  и  Ф.  Шаляпина  в  труппе  тогда  не  числилось  (И.  Козловский  был  единственным  исключением),  хотя  замечательных  артистов  по-прежнему  хватало;  это,  впрочем,  вопрос  за  пределами  нашего  рассмотрения.

«Дирижерская  стратегия»  Самосуда  в  работе  с  хором  уже  по  первой  сцене  абсолютно  ясна:  темп  мучительно  растянут,  внутренний  счет  ведется  на  восьмые,  что  предрасполагает  к  усиленной  кантилене.  Однако  это  не  итальянская  слитность  bel  canto  XVIII  в.,  по  завету  Дж.  Каччини  непрерывно  играющая  филировками  ради  подчеркивания  слова  [2]  и  потому  изящно-кружевная  и  чуть  игривая.  Здесь  звук  непрерывно  нагнетается  в  соответствии  с  развертыванием  мелодических  фраз,  а  из  всех  артикуляционных  элементов  вокальной  речи  выделяются  одни  ударные  слоги  глаголов,  что  и  придает  построениям  парадоксальную  при  сверхмедленном  движении  напористую  устремленность.  Динамическая  и  цезуровочная  «растушевка»  выглядит  гораздо  ближе  по  стилистике  к  церковным  хорам,  чем  к  театральному  действию,  благодаря  довлеющему  принципу  цепного  дыхания.  В  следующем  примере  мы  позволили  себе  снять  аккомпанирующие  условно-немелодические  голоса  хора  и  обозначить  некоторые  особенности  исполнения  по  одной  партии  сопрано:

 



Рисунок  2.  К.В.  Глюк,  «Орфей  и  Эвридика»,  сц.  1,  мелодия  по  партии  верхнего  голоса  с  указанием  исполнительских  приемов  по  записи  1952  г.

 

Укреплению  «религиозных»  ассоциаций  способствует  и  тембровое  решение:  все  поют  «темным»,  прикрытым  звуком,  альты  и  тенора  выступают  вперед,  их  линии-дублировки  на  одном-двух  сменяющихся  тонах  тянутся  густо,  подобно  мелодиям  знаменного  распева  в  гармонизациях  московской  школы  рубежа  XIX—XX  вв.,  и  подпираются  характерными  органными  «русскими»  басами.  В  тех  же  приемах  решена  и  сцена  в  Елисейских  полях,  где  «ангелогласное  пение»  в  храмовой  манере  кажется  особенно  уместным.  Вряд  ли  такая  «панихида»  в  начале  грампластинки  способствовала  реабилитации  Глюка  в  глазах  советских  чиновников  от  искусства…  При  всей  горизонтальной  медлительности,  сцена  чрезвычайно  внутренне  наполнена,  энергетика  трагедии  влечет  горячую  лаву  звука  вперед,  а  Орфей-Козловский,  активно  используя  студийные  эффекты  (приближение  и  удаление  микрофона),  «прошивает»  эту  толщу  нежными  возгласами.  Вот  кто  —  плоть  от  плоти  Глюка,  наследник  Собинова,  интерпретатор  в  полном  соответствии  с  отзывами  рецензентов  1911  г.

Гораздо  менее  убедительны  с  вокально-артикуляционной  точки  зрения  хоры  фурий  из  2  акта.  Значение  речевых  конструкций,  расстановка  синтаксических  цезур,  гармонические  и  мелодические  музыкальные  формулы  значения  фактически  не  имеют.  Единственное,  что  воплощается  —  воинственно-яростный  аффект.  Слова,  и  без  того  по-немецки  короткие  в  тексте  Коломийцева  («Чей  это  гордый  дух  наш  потревожил  слух…»  —  только  один  «четырехсложник»),  окончательно  распадаются  на  слоги,  но  штрих  —  marcato  gravis  –  снабжает  каждую  аккордовую  вертикаль  акустическим  «шлейфом»,  подменяющим  legato  и  хорошо  сочетающимся  с  tremolo  струнного  сопровождения.  Выходы  фурий  звучат  наподобие  «Священной  войны»  —  вступает  в  права  еще  одна,  ставшая  привычной  к  середине  ХХ  в.,  «агрессивная»  русская  хоровая  модель,  не  исключающая,  как  ни  странно,  гигантской  протяженности  дыхательной  фразы.  И  вновь  на  этом  фоне  —  великолепный  солист,  преисполненный  печали.  Пусть  сам  по  себе  хор  звучит  по-солдатски,  сопоставление  впечатляет.

Наименее  убедительным  получился  финальный  апофеоз.  Более  подвижный  темп  легко  бы  его  оживил,  но  тут  сработала,  кажется,  «инерция  классицизма»:  в  Самосуде  проснулся  Направник,  и  сцена  полностью  утратила  тонус,  все  звучит  рыхло  и  приземлено.  Общее  для  хорового  тембра  в  этой  записи  округленное  звучание  производит  впечатление  утрировки  и  не  вызывает,  подобно  начальному,  воспоминаний  о  французском  sombrée,  а  просто  «окает»  и  «ухает»  на  каждом  слоге:  «О-мур,  буг  люб-вю»  вместо  «Амур,  бог  любви».  Для  эстетов  начала  ХХ  в.  хор  Мариинки  звучал,  вероятно,  столь  же  русопято,  как  этот,  записанный  в  советские  времена,  —  для  сторонников  исторически-ориентированного  (аутентичного)  исполнительства  рубежа  тысячелетий.

В  заключение  статьи,  не  могущей  иметь  завершения  и  не  долженствующей  его  иметь  в  год  глюковского  юбилея,  когда  для  России  традиция  работы  с  партитурами  этого  композитора  готова  обрести  новое  дыхание,  обратимся  к  недавнему  примеру  постановки  «Орфея»  силами  «русских  аутентистов»  —  дирижера  Т.  Курендзиса,  оркестра  Pratum  Integrum  и  Камерного  хора  МГК  им.П.И  Чайковского  (концертное  исполнение,  БЗК,  Москва,  15.01.2006)  —  при  участии  именитых  иностранных  солистов:  Анны  Бонитатибус,  Лидии  Тойшер  (Эвридика)  и  Деборы  Йорк  (Амур).  Играли  венскую  (итальянскую)  версию  оперы,  более  близкую  русскому  вокальному  сердцу  и  по  фонетике  слова,  и  по  синтаксической  структуре  фраз.  Как  оценить  исполнение?  Поражала  стилистическая  пестрота:  солисты  упражнялись  в  демонстрации  темпераментов  и  тембровых  красок  на  французский  лад,  оркестр  щеголял  тонкостями  барочных  штрихов,  хор…  При  внимательном  вслушивании  он  остался  все  тем  же  русским  хором,  что  участвовал  в  постановках  и  на  столетие  раньше,  только  по  воле  музыкального  руководителя  пел  все  очень  тихо.  Дикционная  неразборчивость  —  даже  не  самая  большая  беда.  Хотя  и  слова  жаль,  язык  либретто  можно  было  распознать  только  после  вступления  солисток,  отрешившись  от  впечатления,  что  они  используют  специфически  растянутый  «театральный  французский».  Штрихи  и  артикуляция  мелких  фраз  нашим  хористам  так  и  не  дались,  кантилена  тяжела,  в  активных  темповых  фрагментах  проступает  вся  та  же  воинственность,  смягченная  только  динамикой.  Не  хотелось  бы  никого  и  ни  в  чем  упрекать.  Даже  в  условиях  вопиющего  стилевого  дисбаланса  «Орфей»  состоялся,  музыка,  что  называется  «вывезла»,  достаточно  было  спеть  чисто,  что  Камерному  хору  удалось  больше,  чем  прочим  участникам  исполнения.  Однако  опыт  Курендзиса  показал,  что  перспективы  «русского  Глюка»  во  многом  будут  зависеть  от  профессионализма  и  образованности  хормейстеров,  иначе  количество  стилевых  просчетов  очень  легко  переходит  в  качество. 

 


Список  литературы:


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