Статья опубликована в рамках: XXX Международной научно-практической конференции «В мире науки и искусства: вопросы филологии, искусствоведения и культурологии» (Россия, г. Новосибирск, 25 ноября 2013 г.)

Наука: Филология

Секция: Русская литература

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Макрушина И.В. СКВОЗЬ ПРИЗМУ КАРНАВАЛА: О ДВУХ РЕВОЛЮЦИЯХ В РОМАНАХ М. АЛДАНОВА // В мире науки и искусства: вопросы филологии, искусствоведения и культурологии: сб. ст. по матер. XXX междунар. науч.-практ. конф. № 11(30). – Новосибирск: СибАК, 2013.
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СКВОЗЬ  ПРИЗМУ  КАРНАВАЛА:  О  ДВУХ  РЕВОЛЮЦИЯХ  В  РОМАНАХ  М.  АЛДАНОВА

Макрушина  Ирина  Владимировна

канд.  филол.  наук,  доцент  Стерлитамакского  филиала

Башкирского  государственного  университета,  РФ,  Республика  Башкортостан,  г.  Стерлитамак

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THROUGH  THE  PRISM  OF  THE  CARNIVAL:  ABOUT  TWO  REVOLUTIONS  IN  M.  ALDANOV’S  NOVELS

Makrushina  Irina  Vladimirovna

candidate  of  philological  sciences,  associate  professor  of  Sterlitamak  Branch  of  the  Bashkir  State  University,  Russian  FederationRepublic  of  Bashkortostan  Sterlitamak

 

АННОТАЦИЯ

Истолкование  пороговых  ситуаций  европейской  и  русской  истории  опирается  в  романах  М.  Алданова  на  литературную  традицию  карнавализации  художественного  мировосприятия.  Как  видно  из  романов  писателя,  наиболее  ярко  карнавальная  инверсия  норм  и  правил  проявляется  в  революционных  событиях.  Изменения  в  социальной  иерархии  на  историческом  переломе  отвечают  логике  карнавальных  перемещений  «верха»  и  «низа»,  «хвалы»  и  «брани»,  «агонии»  и  «рождения». 

ABSTRACT

Interpretation  of  threshold  of  Russian  and  European  history  is  based  in  the  novels  by  M.  Aldanov  on  literary  tradition  of  carnivalization  of  perception  of  the  world.  As  can  be  seen  from  the  novels  of  the  writer,  the  most  brightly  carnival  inversion  of  norms  and  rules  is  manifested  in  the  revolutionary  events.  Changes  in  the  social  history  on  the  historic  turn  correspond  to  the  logic  of  the  carnival  move  of  the  “top”  and  the  “bottom”,  “prasing”  and  “battle”,  “agony”  and  “birth”. 

 

Ключевые  слова:  метароман;  художественная  историософия;  карнавализация;  «логика  обратности»;  игра

Keywords:  metanovel;  art  historiosophy;  carnivalization;  “the  logic  of  the  opposite”;  play 

 

Марк  Алданов  (1886—1957)  —  выдающийся  романист-историк,  крупнейший  прозаик  русского  зарубежья.  Его  наследие  включает  в  себя  психологическую  публицистику,  представленную  несколькими  книгами  портретных  очерков  исторических  лиц;  перу  писателя  принадлежат  рассказы,  пьесы,  киносценарии,  книга  философских  диалогов  «Ульмская  ночь»  (1953),  многочисленные  заметки  и  размышления  на  историко-политические  темы,  им  написаны  статьи  о  литературе  проблемного  и  обзорного  характера,  рецензии,  воспоминания,  эссе.  Будучи  химиком  по  образованию,  Алданов  издавал  и  научные  труды:  «Актинохимия»  (1936)  и  «К  возможности  новых  концепций  в  химии»  (1950).  Но  особое  значение  представляет  историческая  серия  писателя,  состоящая  из  16  романов  и  повестей,  охватывающих  почти  два  столетия  русской  и  европейской  истории  (XVIII—XX  вв.).  Созданию  этого  цикла  («по  существу  одной  грандиозной  книги  о  месте  России  в  европейской  истории»  [1,  с.  173])  Алданов  посвятил  всю  свою  жизнь,  начав  его  в  1921  году  небольшим  по  объему  произведением  «Святая  Елена,  маленький  остров»  и  завершив  в  1956  году  романом  «Самоубийство».  Книги  Алданова  о  прошлом  и  современности  самостоятельны,  но  связаны  между  собой  единой  историософской  концепцией,  общими  действующими  лицами. 

Роман  «Девятое  Термидора»  (1923),  открывающий  тетралогию  «Мыслитель»,  посвящен  эпохе  Французской  революции  (писатель  воссоздает  термидорианский  переворот  1794  года).  Трилогия  «Ключ»-«Бегство»-«Пещера»  (1930—1934)  Алданова  представляет  собой  взгляд  с  Запада  на  русскую  смуту,  «на  ее  предысторию  («Ключ»),  на  вынужденное  бегство  многих,  на  тщетность  попыток  найти  на  чужбине  пещеру  —  убежище»  [11,  с.  22],  где  можно  укрыться  от  эпохи  безвременья.  В  последнем  романе  писателя  «Самоубийство»  (1956—1957)  действие  охватывает  два  десятилетия  —  самое  переломное  время  в  истории  России  XX  столетия  —  от  II  съезда  РСДРП  до  смерти  Ленина.  Но  произведение  являет  собой  не  эпопею,  воссоздающую  все  события  этого  периода  (три  русских  революции,  две  войны:  мировую  и  гражданскую),  а  историософское  исследование  эпохи.

Как  исторический  романист  М.  Алданов  сформировался  уже  в  эмиграции.  Опираясь  на  традиции  русской  классической  литературы  XIX  века,  сознавая  свою  причастность  эпохе  Л.  Толстого,  Алданов  вместе  с  тем  испытал  влияние  французской  литературы.  Любитель  скептических  размышлений,  наделенный  даром  иронии,  писатель  по  праву  может  считаться  продолжателем  Рабле,  Монтеня,  Паскаля,  Вольтера,  Франса,  художников  и  мыслителей  в  равной  мере.

По  утверждению  М.М.  Бахтина,  Шатобриан  когда-то  выдвинул  идею  о  гениях-матерях,  которые  «…рождают  и  вскармливают  всех  остальных  великих  писателей  данного  народа»  [7,  с.  137].  Таким  гением  во  французской  культуре  по  праву  считается  Франсуа  Рабле  —  величайший  гуманист  эпохи  Ренессанса.  Его  знаменитый  роман  «Гаргантюа  и  Пантагрюэль»  представляет  собой  как  бы  живой  фрагмент  карнавала,  явившегося  на  страницы  книги  во  всей  своей  непосредственности.  Рабле  выступил  в  своем  творчестве  как  «…пассивный  медиум  карнавальной  стихии»  (Н.К.  Бонецкая)  [8,  с.  108].  В  монографии  М.  Бахтина  о  Рабле,  ставшей  крупнейшим  культурным  событием,  не  только  осмыслен  опыт  французского  писателя  по  «перевоплощению»  карнавала  в  литературу,  но  и  обозначена  роль  карнавальной  традиции  и  близких  ей  явлений  карнавализации.  Раблезианством  «испытывали»  Данте,  Боккаччо,  Сервантеса,  Вольтера,  Гете  (Л.М.  Баткин)  [5,  с.  117].  Столь  разных  на  первый  взгляд  авторов  сближает  использование  карнавально-гротескных  форм,  которые  служат  воплощению  вольности  художественного  вымысла,  освобождая  сознание  от  господствующих  в  мире  условностей  и  ходячих  истин. 

Как  убедительно  показывает  М.  Бахтин  в  своей  книге  о  Рабле,  влияние  карнавала  было  огромным  во  все  эпохи  развития  литературы.  Утратив  живые  связи  с  народной  площадной  культурой  и  став  чисто  литературной  традицией,  карнавал  продолжает  существовать  в  суженном  и  ослабленном  варианте.  В  литературу,  далеко  отстоящую  во  времени  от  раблезианского  феномена  карнавализации,  зрелищно-игровые  формы  включаются  в  редуцированном  виде  (М.  Бахтин).  Однако,  несмотря  на  позднее  переосмысление,  знаковые  формулы  карнавала  сохраняются,  превратившись  в  средство  претворения  автором  определенной  художественной  концепции  мира  и  человека. 

Традиция  карнавализации  художественного  мировосприятия  прослеживается  вплоть  до  XX  века,  особенно  в  произведениях,  «моделирующих»  исторический  процесс  [9,  с.  151].  Ход  истории  сопровождается  неизбежными  потрясениями  и  катаклизмами.  Социально-политические  перевороты,  одинаковые  у  всех  народов  мира  во  все  времена,  не  могут  не  подвергаться  карнавализованному  оформлению.  Феномен  «карнавала»  активно  причастен  алдановской  историософской  концепции,  в  основе  которой  идея  бренности  человеческих  деяний,  суетности  земных  страстей.  Принципу  карнавализации  как  ведущему  компоненту  художественного  целого  принадлежит  значительная  организующая  роль  в  композиции  произведений  писателя.  В  своих  романах  Алданов  показывает,  как  в  разные  эпохи  в  разных  странах  вершится  на  огромной  территории  вселенский  карнавал,  в  котором  задействовано  множество  вымышленных  и  реальных  персонажей.

В  период  революций  на  историческом  олимпе  появляются  карнавальные  фигуры,  вполне  отвечающие  основным  акциям  разыгрываемого  действа:  осмеянию  и  уничтожению  прежнего  строя  жизни.  Не  чужд  карнавальной  культуре  и  образ  алдановского  Ленина  в  «Самоубийстве»:  «Он  и  думал  на  странном  языке,  частью  волжском,  частью  калужском,  очень  особом  и  чуть  шутовском,  с  разными  уменьшительными,  грубо-насмешливыми  словами»  (выделено  мною.  —  И.М.)  [4,  с.  14].  В  одном  из  старых  журналов  Ленин  находит  фотографию,  на  которой  запечатлена  историческая  сцена  у  гроба  скончавшейся  королевы  Виктории.  Изображение  сопровождено  верноподданническим  комментарием,  пророчащим  славное  будущее  европейским  монархиям:  «Царствованием  Виктории  <закончился>  в  истории  …период  бурь…  <Наступает  эра>  мира,  общего  благоденствия  и  прогресса  на  началах  свободы»  [4,  с.  14—15].  Чтение  доставляет  будущему  вождю  большевиков  искреннее  наслаждение:  «Экое  однако  дурачье!  Пора  бы  им  в  желтые  домики…  Ничего,  дождутся!  Все  они  дождутся!»  [4,  с.  14—15].  Своеобразная  манера  мыслить  выдает  человека,  весь  резерв  психики  которого  подчинен  ненависти.  Ленин  твердо  уверен  в  своих  огромных  силах,  способных  устроить  вселенский  ураган.  Бранное  поведение,  оформленное  в  карнавальном  ключе,  травестирует  идею  монархии  (подготавливая  тем  самым  реально-историческую  гибель  самодержавия  как  феномена).  На  смену  русскому  царизму  грядет  симбирский  шут. 

Революционные  эпохи  чреваты  превращениями,  снимающими  всякую  претензию  на  незыблемость  и  вечность  любых  установлений.  Так,  в  «Пещере»  богач  Нещеретов,  чье  состояние  превышало  пятьдесят  миллионов,  после  революции  превратился  во  второстепенного  компаньона  Альфреда  Певзнера,  сказочно  разбогатевшего  за  границей  на  кинематографическом  деле:  «мелкий  газетчик  стал  хозяином»  [3,  с.  196].

Осмысляя  социально-исторические  перемены,  связанные  со  «смутой»  во  Франции,  Алданов  также  опирается  на  принцип  карнавализации,  отражающий  «смену  правд  и  властей».  Собираясь  в  Париж  на  революционный  карнавал,  Штааль  (тайный  агент  английской  разведки)  «рядится»  в  карманьолу,  символизирующую  республиканскую  простоту  нравов.  В  роли  «костюмера»,  помогающего  герою  изменить  свой  социальный  образ,  выступает  шеф  полицейской  разведки  имперских  войск  («Девятое  Термидора»).  Жизнь  во  Франции  напоминает  пеструю  ярмарку,  где  причудливо  соседствуют  бойко  выставленные  напоказ  обветшалая  правда  и  новая.  Игорный  клуб,  в  который  направились  Штааль  и  мосье  Дюкро,  расположился  в  Palais  Egalite.  Игра  шла  в  огромной  высокой  комнате  —  некогда  роскошной  зале  бывшего  дворца.  Былое  великолепие  монархии  уже  травестировано  чернью,  все  запущено,  порвано,  грязно:  «На  одной  из  стен,  <обтянутых  дорогим  шелком>,  был  прибит  ржавым  крюком  …большой  картон  с  «Декларацией  прав  человека  и  гражданина»  [2,  с.  269]. 

Перемены  эпохи  Французской  революции  отвечают  логике  карнавальных  перемещений  «верха»  и  «низа».  Так,  в  игорном  доме  праздный  люд  придается  разгульным  увеселениям  и  обжорству.  Разношерстной,  большей  частью  низкой  публике  прислуживает  старый  гарсон,  напоминающий  наружностью  Людовика  XIV,  подавая  лучшие  вина  французских  королей  из  версальских  погребов.  Лакей,  похожий  на  короля,  смотрел  на  распорядителя  клуба,  бывшего  графа  или  даже  герцога,  «…с  грустным,  сочувственным  видом,  свидетельствовавшим  о  понимании  их  обоюдного  падения»  (выделено  мною  —  И.М.)  [2,  с.  272].

Созерцая  чехарду  человеческих  страстей,  один  из  героев  тетралогии  «Мыслитель»,  комментатор  истории,  мрачный  скептик  Пьер  Ламор  поминает  «старого  умницу  Рабле».  «Увенчание  —  развенчание»  в  качестве  основного  действа  представляет  идею  исторического  карнавала  в  романе  «Девятое  Термидора».  В  тюрьме,  в  Тампле,  в  присутствии  заговорщика-термидорианца  Барраса  портной  бил  палкой  юного  престолонаследника  Людовика  XVII,  короля  Франции  и  Наварры.  Впоследствии  молва  домыслила  сцену:  заморенного  длинноволосого  мальчика  в  лохмотьях  избил  палкой  до  полусмерти  сам  Робеспьер.  В  карнавальной  системе  образов  упраздненный,  гонимый  король  есть  шут.  Когда  проходит  время  царствования,  его  переодевают  («травестируют»)  в  шутовской  наряд.  Смене  одежд  эквивалентны  брань  и  побои,  которыми  сопровождается  развенчание  (М.  Бахтин)  [7,  с.  220].  Здесь  вновь  действуют  законы  игрового  пространства.  Портной,  побивая  бывшего  дофина,  по  существу  не  жесток,  он  просто  «играет  по  правилам»:  «это  революционное  действие  должно  поддержать  в  глазах  влиятельного  члена  Конвента  его  репутацию  доброго  санкюлота»  [2,  с.  233].

Благодаря  выходу  народных  масс  на  площадь  всякая  революция  приобретает  карнавальный  характер.  Но,  по  наблюдению  В.Ф.  Кормера,  в  реальных  исторических  событиях  карнавальные  элементы  утрачивают  характер  «ликующего  веселья»  [10,  с.  181].  Площадное  революционное  действо  —  это  карнавал  переродившийся.  Юлий  Штааль,  оказавшись  внутри  этой  безудержной,  неуправляемой  стихии,  почувствовал,  как  им  овладевает  «…общее  настроение  беспокойства,  тревоги  …  и  беспредметного  гнева  …Оглянувшись  вокруг  себя,  он  подумал,  что  революция  точно  была  здесь,  в  этой  обозленной  и  напуганной  толпе»  [2,  с.  262],  заражающей  каждого,  кто  внутри  нее,  исступленным  безумием.  Малейший  импульс  тут  же  подхватывается  тысячами  волн,  составляющих  это  людское  море:  «Толпу  прорвало  ненавистью…  Толпа  с  ревом  хлынула»  [2,  с.  262].  В  рассматриваемой  ситуации  карнавал  утрачивает  легкость  игры:  раскованность  оборачивается  готовностью  к  насилию,  обновляющий  смех  сменяет  тупая  мрачная  злоба.  Революция  явилась  парадоксальным  ответом  на  проповедь  Руссо,  с  его  идеями  просвещения  и  гуманизма.  Славословие  природному  естеству  человека  увенчалось  превращением  Франции  в  дремучий  лес,  населенный  разбойниками.

Однако  своим  гнусным  и  отвратительным  обликом  революции  обязаны  не  толпе.  Самые  ужасные  и  кровавые  действа,  по  мысли  писателя,  разыгрываются  по  вине  людей,  достигших  в  период  «смуты»  последних  вершин  власти.  Сцена  казни  жирондистов  являет  собой  не  ритуальное  развенчание,  выражающее  представление  о  постоянном  обновлении  бытия,  а  кровавое  растерзание  жертв:  «Отчего  нож  имеет  закругленную  форму?..  Серп…  Жатва…  Революция  жнет!..»  [2,  с.  216].  Вместо  «смеющегося  народного  хора»,  бранящего  обреченное  на  историческую  смерть  прошлое,  напряженно  безмолвная  толпа,  готовая  прорваться  гневом  возмущения:  «Картечью  по  ним,  по  всем!  Где  пушки  Суворова?  Будь  проклята  временная  Свобода!..  Все  гнусно,  все  ложь,  все  обман!..»  [2,  с.  217].  Карнавал  революций  ужасен:  аресты,  тюрьмы,  кровавый  террор.  Алданов  прибегает  к  историческим  параллелям,  соотнося  события  из  времен  революции  во  Франции  с  октябрьским  переворотом  в  России.  Петроградская  толпа  похожа  на  парижскую.  Нет  ликующих,  охваченных  духом  обновления  лиц.  Печальные  и  понурые  люди  наблюдают  «невеселый  праздник  на  развалинах  …  российского  государства»  («Бегство»).

Двор  монастыря,  в  котором  помещается  Якобинский  клуб,  являет  собой  малую  модель  большой  карнавальной  площади  («Девятое  Термидора»).  Владелец  лавки  съестных  продуктов  Муций  Сцевола,  огромный  красноносый  здоровяк-бургундец,  игриво  сообщает  завсегдатаям  клуба  о  том,  что  полученное  им  винцо  будет  отпускаться  почти  даром.  Прогуливающиеся  по  дворику  «революционеры»  в  атмосфере  благодушного  веселья  «…обсуждают  вопрос  о  том,  насколько  преступно  и  заслуживает  ли  смертной  казни  восклицание  «Черт  возьми!»  (большинство  склонялось  к  мысли,  что  восклицание  смертной  казни  не  заслуживает)»;  «…рассказывают  веселые  анекдоты  о  видных  членах  клуба…»  [2,  с.  260].  Скептически  оценивая  внутреннюю  самостоятельность  и  зрелость  якобинцев,  Алданов  через  своего  героя  сравнивает  их  со  школьниками:  «Эта  прогулка  по  двору  и  оживленные  разговоры  вызвали  в  уме  Штааля…  воспоминание:  …большая  перемена  в  Шкловском  училище  в  промежутке  между  классами,  —  разговоры  о  первом  ученике,  о  хороших  и  нехороших  товарищах,  об  интересных  и  неинтересных  уроках»;  «…  вновь  поступившие  члены  клуба  …  почтительно  слушали  небрежные  объяснения  старших…  <так>  в  училище  старички-второгодники  руководили  первыми  шагами  новичков»  [2,  с.  260—261].  На  монастырском  дворике  царит  фривольно-инфантильное  небрежение  революцией.  Всерьез  ею  занимается  только  кучка  фанатиков-идеалистов,  не  понимающих,  что  бесконечные  перевороты  ведут  только  к  повторению  уже  пройденного,  к  «истории  без  конца».  Так,  по  замыслу  писателя,  лавочник  и  компания,  сами  того  не  ведая,  надевают  на  грозную  и  значительную  революцию  Робеспьера  шутовской  колпак,  превращая  ее  в  фарс.

В  романе  «Девятое  Термидора»  в  сцене  во  дворе  Якобинского  монастыря  Алданов  изобразил  народ,  пришедший  послушать  историческую  речь  Робеспьера  (его  предсмертное  завещание).  Поначалу  толпа  встречает  виновника  и  вдохновителя  террора  восторженным  ревом.  Фигура  Робеспьера  производит  впечатление  совершенной  неподвижности  благодаря  деталям  внешнего  облика:  неправильному  телосложению,  напудренной  голове,  бесстрастному  мертвенно-бледному  лицу,  стеклянному  взгляду  глаз,  закрытых  очками.  Застывшее  изваяние,  с  картонной  маской  неживого  лица,  наводит  на  толпу  мистический  ужас.  Людское  море  исступленно  поклоняется  идолу.  Однако  народ  переменчив  к  своим  кумирам.  Картонное  божество  вскоре  будет  развенчано  и  умерщвлено.  Уже  прозвище  Робеспьера  «Неподкупный»,  ставшее  синонимом  фанатизма  (бескомпромиссное  служение  добродетели,  насаждаемой  ценой  революционного  насилия,  оборачивается  фанатизмом),  содержит  в  себе  момент  развенчания.  По  наблюдению  М.  Бахтина,  прозвище  делает  «…прозываемого  определенным,  исчерпанным,  разгаданным  и  больше  ненужным  («пора  на  смену»)».  Прозвище  фамильярно,  им  «…прогоняют,  пускают  его  вслед,  как  ругательство»  [6,  с.  147—148].

Завершающий  акт  исторического  действа,  рассчитанный  на  «реакциональное»  переживание,  собирает  в  Конвенте  полные  трибуны  зрителей.  В  руках  у  шумных,  грубоватых  людей,  составляющих  публику  —  кульки  с  едой  (должно  быть,  это  как  раз  посетители  лавки  Муция  Сцеволы).  После  бурной  ночи  обильных  возлияний  утомленные  пьянством  и  весельем  люди  пришли  поглазеть  на  низложение  Робеспьера.  В  ожидании  всеобщей  потасовки,  в  которую  обещает  перерасти  «горячее»  зрелище,  многие  предусмотрительно  захватили  с  собой  палки  (традиционный  карнавальный  символ  развенчания).  Уличные  зеваки  профанируют  революцию,  превращая  тяжелый,  сумрачный  мир  крови  и  эшафота  в  игровой  спектакль.  Так  Французской  революции  сообщается  преходящий  характер.  Парижское  действо  —  лишь  звено  в  замкнутой  цепи  без  конца  повторяющейся  истории.

В  романе  «Девятое  Термидора»  значительна  сцена,  изображающая  истребление  одним  титаном  другого.  В  крике  обреченного  на  смерть  Дантона  ярость  отчаяния  соперничает  с  пророческим  проклятием:  «Робеспьер,  ты  скоро  последуешь  за  мной!»  [2,  с.  243].  И  вот  история,  подчиняясь  неумолимой  логике  вечного  карнавала,  подготовила  новое  «развенчание»,  превратив  Неподкупного  в  карнавальное  «смешное  страшилище»,  которое  народ…  терзает  на  площади»  (М.  Бахтин)  [7,  с.  236]:  «К  глумлению  врагов  Робеспьер  был  почти  равнодушен.  Но  он  видел,  что  его  осыпали  бранью  толпа,  стража,  носильщики,  прислуга  Конвента,  тот  самый  народ,  который  благоговейно  на  него  молился»  [2,  с.  299].  После  исторической  сцены  ареста  в  Конвенте  и  неудачной  попытки  побега  тирана  принесли  изувеченным  в  тюрьму  Консьержери  (во  время  боя  выстрелом  была  раздроблена  челюсть).  Судорога  свела  картонное  лицо  поверженного  идола:  «как  будто  лопнула  та  пружина,  которая  растягивала  куски  картона  на  костяном  остове  головы,  и  эти  куски  теперь  корчились  и  ходили  в  разные  стороны»  [2,  с.  287—288].  Упраздненный  тиран  по  законам  карнавала  приобщается  полюсу  «грубо-телесного  низа»:  возле  тяжело  раненого  Робеспьера  суетится  мальчик-жандарм  по  фамилии  Mеrde  (дерьмо)  «…и  с  жаром  рассказывает  публике,  что  это  он  убил  диктатора»  (выделено  автором)  [2,  с.  299].  Исторический  карнавал  изобилует  чертами,  резко  диссонирующими  с  духом  веселой  амбивалентности.  Гильотинированию  Робеспьера  у  Алданова,  состоявшемуся  на  площади  в  центре  Парижа,  сопутствует  радостный  звериный  рев  толпы,  устроившей  на  месте  казни  диктатора  бал.

В  романе  «Девятое  Термидора»  символична  сцена,  в  которой  изображен  народ,  сжигающий  на  площади  Брюсселя  дерево  свободы  (прежде  на  Grande  Place  предавали  огню  скипетры  и  изображения  тиранов).  Мудрость  костра  в  его  преображающей  активной  мощи,  способной  обращать  в  ничто  исчерпавшие  себя  формы.  Символизируя  быстротечность  всего  сущего,  образ  костра  глубоко  связан  с  карнавализованным  восприятием  истории.  Сильный  и  разрушающий,  огонь  «пожирает»  все  суетное,  уносит  в  небытие  то,  что  казалось  значительным  и  незыблемым. 

Итак,  постижение  исторического  бытия  человечества  опирается  у  Алданова  на  литературную  традицию  карнавализации  художественного  мировосприятия.  Принцип  карнавализации  формирует  концептуальное  единство  метароманного  целого,  ему  доступны  многие  возможности  художественного  познания  и  оценки  мира  и  человека.  Писатель  использует  эстетический  потенциал  карнавализации  в  качестве  приема,  «работающего»  на  его  философию  истории.  Осмыслив  историю  в  духе  карнавала,  Алданов  сделал  возможным  ее  игровое  измерение.  По  мысли  М.  Эпштейна,  понятие  «˝игра˝  применяется  к  таким  процессам,  где  …чередуются  противоположные  состояния,  плюс  меняется  на  минус,  где  постоянна  только  сама  перемена»  [12,  с.  299].  Описанный  М.  Бахтиным  раблезианский  карнавал  являет  собой  утопическую  фантазию,  радостный  праздник  перемен  и  обновлений,  раскрепощающий  здоровое  естество  «коллективного  тела»  и  утверждающий  неистощимую  формообразующую  «энергийность»  социального  бытия.  «Прочитывая»  прошлое  человечества  в  категориях  карнавала,  Алданов  не  ощущает  положительной  стихии  «раблезианского  экстаза».  История  «начинена»  противозаконностью:  власть  получается  и  удерживается  посредством  преступлений  отдельных  лиц  или  групп  людей.  Отрицательное  отношение  писателя  к  «карнавальной»  практике  революционных  переворотов  связано  не  только  с  проявлениями  жестокости  со  стороны  «освобожденной»  народной  стихии  (разгульное  кровавое  право  толпы,  предающейся  на  обломках  рухнувшего  режима  вакханалии).  Благодаря  принципу  карнавализации  претворяется  идея  вечного  возвращения  в  истории.  Исторические  метаморфозы  —  лишь  бессмысленная  беличья  круговерть,  бесконечная  чреда  повторов. 

В  романах  Алданова  карнавал  сохранил  свою  символику  (структурные  диады,  отражающие  изменения  в  социальной  иерархии  на  историческом  переломе:  верх-низ,  хвала-брань,  рождение-агония;  ритуальные  действия:  увенчание-развенчание).  Но  вместо  беззаботной  сопричастности  коллективному  «веселью»  на  празднике  «превращений»  писатель-скептик  черпает  из  истории  «сырье  для  умственной  горечи».  Карнавальные  образы  и  символы  служат  художественному  воплощению  пессимистических  взглядов  Алданова  на  ход  истории.  Игровым  проявлениям  в  сфере  исторического  бытия  противостоит  мудрая,  всеведущая  серьезность  писательской  оценки.  М.  Алданов,  художнически  остро  прозревая  жестокую  карнавальность  мира,  верит  в  существование  истинной  жизни,  руководствующейся  непреходящими  ценностями. 

 

Список  литературы:

1.Агеносов  В.В.  Литература  русского  зарубежья  (1918—1996).  М.:  Терра.  Спорт,  1998.  —  543  с.

2.Алданов  М.А.  Девятое  Термидора  //  Алданов  М.А.  Собрание  сочинений:  В  6  т.  М.:  Правда,  —  1991.  —  Т.  1.  —  С.  37—316.

3.Алданов  М.А.  Пещера  //  Алданов  М.А.  Собрание  сочинений:  В  6  т.  М.:  Правда,  —  1991.  —  Т.  4.  —  С.  5—410.

4.Алданов  М.А.  Самоубийство  //  Алданов  М.А.  Собрание  сочинений:  В  6  т.  М.:  Правда,  —  1991.  —  Т.  6.  —  С.  5—446.

5.Баткин  Л.М.  Смех  Панурга  и  философия  культуры  //  Вопросы  философии.  —  1967.  —  №  12.  —  С.  114—123.

6.Бахтин  М.М.  Дополнения  и  изменения  к  «Рабле»  //  Вопросы  философии.  —  1992.  —  №  1.  —  С.  134—164.

7.Бахтин  М.М.  Творчество  Франсуа  Рабле  и  народная  культура  средневековья  и  Ренессанса.  М.:  Художественная  литература,  1965.  —  543  с.

8.Бонецкая  Н.К.  Жизнь  и  философская  идея  Михаила  Бахтина  //  Вопросы  философии.  —  1996.  —  №  10.  —  С.  94—112.

9.Карнавализация  //  Литературный  энциклопедический  словарь.  М.:  Советская  энциклопедия,  1987.  —  С.  151—153.

10.Кормер  В.Ф.  О  карнавализации  как  генезисе  «двойного  сознания»  //  Вопросы  философии.  —  1991.  —  №  1.  —  С.  166—185. 

11.Чернышев  А.  Гуманист,  не  веривший  в  прогресс:  Вступит.  статья  //  Алданов  М.А.  Собрание  сочинений:  В  6  т.  М.:  Правда,  —  1991.  —  Т.  1.  —  С.  3—32.

12.Эпштейн  М.  Парадоксы  новизны:  о  литературном  развитии  XIX—ХХ  веков.  М.:  Советский  писатель,  1998.  —  416  с.

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